Kirjailija
Ravindranath Tagore
Kirjat ja teokset yhdessä paikassa: 17 kirjaa, julkaisuja vuosilta 2001–2024, suosituimpiin kuuluu Postmaster Ani Itar Katha. Vertaile teosten hintoja ja tarkista saatavuus suomalaisista kirjakaupoista.
17 kirjaa
Kirjojen julkaisuvuodet: 2001–2024.
रवीन्द्रनाथ एक गीत हैं, रंग हैं और हैं एक असमाप्त कहानी। बांग्ला में लिखने पर भी वे किसी प्रांत और भाषा के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि समय की चिंता में मनुष्य को केन्द्र में रखकर विचार करने वाले विचारक भी हैं। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' उनके लिए नारा नहीं आदर्श था। केवल 'गीतांजलि' से यह भ्रम भी हुआ कि वे केवल भक्त हैं, जबकि ऐसा है नहीं। दरअसल, हिवटमैन की तरह उन्होंने 'आत्म साक्ष्य' से ही अपनी रचनाधर्मिता को जोड़े रखा। इसीलिए वे मानते रहे कविता की दुनिया में दृष्टा ही सृष्टा है 'अपारे काव्य संसारे कविरेज प्रजापति।' हालांकि वे पारंपरिक दर्शन की बांसुरी के चितेरे हैं, फिर भी इसमें सुर सिर्फ रवीन्द्र के हैं। अपनी आस्था और शोध के सुर । कला उनके लिए शाश्वत मूल्यों का संसार था।
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, चित्रकार, संगीतज्ञ और समाज-सुधारक थे। उनके लगभग 50 कविता-ग्रंथ, 8 उपन्यास, 4 लघु उपन्यास, निबंध, यात्रा वृत्तांत, नाटक और दो हज़ार से अधिक गीत हैं। साहित्य में इतनी विधाओं में लिखने के बावजूद उनकी मान्यता शायद कहानी के कारण सर्वाधिक है। उनकी कहानियों में यथार्थ और आदर्शवाद का मिश्रण पाठक को मिलता है। जिसके माध्यम से वे बंगाल के ग्रामीण और शहरी परिवेश का जीवंत चित्रण करते हैं। उनकी कहानियों में स्त्री-पात्र ही कहानी का केन्द्र हैं। उनकी महिला-पात्र विद्रोही या बागी नहीं हैं लेकिन अपने सामाजिक दायरे के अन्दर रहकर अपने लिए जगह बनाती मिलती हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में 100 कहानियाँ लिखी हैं जिसमें से 11 अत्यंत लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण कहानियाँ इस संकलन में हैं।
रवीन्द्रनाथ एक गीत हैं, रंग हैं और हैं एक असमाप्त कहानी। बांग्ला में लिखने पर भी वे किसी प्रांत और भाषा के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि समय की चिंता में मनुष्य को केन्द्र में रखकर विचार करने वाले विचारक भी हैं। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' उनके लिए नारा नहीं आदर्श था। केवल 'गीतांजलि' से यह भ्रम भी हुआ कि वे केवल भक्त हैं, जबकि ऐसा है नहीं। दरअसल, विटमैन की तरह उन्होंने 'आत्म साक्ष्य' से ही अपनी रचनाधर्मिता को जोड़े रखा। इसीलिए वे मानते रहे कविता की दुनिया में दृष्टा ही सृष्टा है अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।' हालांकि वे पारंपरिक दर्शन की बांसरी के चितेरे हैं, फिर भी इसमें सुर सिर्फ रवीन्द्र के हैं। अपनी आस्था और शोध के सुर। कला उनके लिए शाश्वत मूल्यों का संसार था।
रवीन्द्रनाथ एक गीत हैं, रंग हैं और हैं एक असमाप्त कहानी। बांग्ला में लिखने पर भी वे किसी प्रांत और भाषा के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि समय की चिंता में मनुष्य को केन्द्र में रखकर विचार करने वाले विचारक भी हैं। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' उनके लिए नारा नहीं आदर्श - था। केवल 'गीतांजलि' से यह भ्रम भी हुआ कि वे केवल भक्त हैं, जबकि ऐसा है नहीं। दरअसल, विटमैन - की तरह उन्होंने 'आत्म साक्ष्य' से ही अपनी रचनाधर्मिता को जोड़े रखा। इसीलिए वे मानते रहे कविता की दुनिया में दृष्टा ही सृष्टा है 'अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।' हालांकि वे पारंपरिक दर्शन की बांसुरी के चितेरे हैं, फिर भी इसमें सुर सिर्फ रवीन्द्र के हैं। अपनी आस्था और शोध के सुर। कला उनके लिए शाश्वत मूल्यों का संसार था।
GEETANJALI IS A BOOK OF POEMS WRITTEN BY THE OBEL LAUREATE, RABINDRANATH TAGORE. THIS BOOK CONTAINS THE TRANSLATED VERSIONS OF 103 BENGALI POEMS WRITTEN BY THE FAMOUS POET. IT WAS PUBLISHED ORIGINALLY IN THE YEAR 1910, IN BENGALI. THE ENGLISH VERSION OF THE BOOK WAS FIRST PUBLISHED IN THE YEAR 1912. RABINDRANATH TAGORE BECAME THE FIRST NONEUROPEAN TO WIN THE NOBEL PRIZE FOR LITERATURE, THANKS TO GEETANJALI. THE WORD GEETANJALI DIRECTLY TRANSLATES TO 'SONG OFFERINGS', AND THE POEMS IN THE BOOK HAVE MANY METAPHYSICAL ELEMENTS. THESE POEMS EVEN REFER TO A UNION WITH THE 'SUPREME BEING'. RABINDRANATH TAGORE'S POEMS REFLECT HIS VIEWS ON LIFE AND SPIRITUALITY, AND TALK ABOUT THE MYSTERY, MELANCHOLY, AND COLOR SURROUNDING EVERYDAY LIFE. RABINDRANATH TAGORE WAS BORN ON MAY 7, 1861. TAGORE WAS A NOVELIST, POET, ESSAYIST, WRITER, PLAYWRIGHT, SONG COMPOSER, AND PAINTER. HE IS WIDELY KNOWN FOR CHANGING THE FACE OF BENGALI AND INDIAN LITERATURE AND MUSIC THROUGH HIS WORKS. TAGORE IS ONE OF THE MOST ESTEEMED RENAISSANCE FIGURES OF INDIA AND WAS RESPONSIBLE FOR PUTTING INDIA ON THE LITERARY MAP WITH HIS AWARDWINNING WRITING. HE WAS ALSO WIDELY ACCLAIMED AS A POLITICAL, RELIGIOUS, AND SOCIAL THINKER AND INNOVATOR, DUE TO HIS WORK THROUGH SANTINIKETAN AND VISWABHARATI. HIS OTHER FAMOUS WORKS INCLUDE THE HOME AND THE WORLD, THE POST OFFICE, CHOKHER BALI, KABULIWALA, GORA, THE GARDENER, AND THE LAST POEM....हे छोटंस फूल पटकन खुडून घे, विलंब करू नकोस अन्यथा ते कोमेजून जमिनीवर धुळीत पडेल, अशी मला भीती वाटते. त्याला तुझ्या गळ्यातील हारात जागा मिळाली नाही तरी चालेल; पण तुझ्या हाताने खुडून घेताना होणाऱ्या वेदनेने बहुमानितकर आणि खुडून घे. मी सावध होण्याआधी बघताबघता दिवस ढळेल आणि तुझ्या अर्चनेसाठी अर्पण होण्याची वेळ निघून जाईल, अशी मला भीती वाटते. ह्या फुलाचा रंग जरासा उडालेला असला आणि गंध मंद झाला असला, तरी त्याला तुझ्या पूजेत सहभागी व्हायची संधी दे. वेळेतच त्याला खुडून घे.
THIS IS A FICTION, THE VERY FIRST NOVEL SCRIPTED IN 1883 BY RAVINDRANATH TAGORE, AT THE AGE OF 22. THIS NOVEL HAS THE BACKGROUND OF ROYAL FAMILIES AND THE RITES AND RITUALS FOLLOWED BY THEM. THIS IS A STORY OF THE ROYAL FAMILY OF KING PRATAPADITYA AND HIS SON UDAYADITYA. THE FORMER IS A SHREWD KING READY TO TAKE ANY ACTION SO AS TO MAINTAIN THE DECORUM OF BEING A KING; WHEREAS THE LATER BELIEVES IN BEING A JUST AND KIND HUMAN BEING, COMPASSIONATE AS WELL. THE KING TAKES ALL THE ACTIONS THAT HE CAN TO PREVENT UDAY FROM BEING A NORMAL HUMAN BEING. HE WANTS HIS SON TO LEARN THE IMPORTANCE OF BEING RUDE AND CRUEL IF NEEDED. UDAY'S SISTER VIBHA IS MARRIED TO RAMCHANDRARAI, ANOTHER KING. BUT HE IS INSULTED MANY TIMES AT THE HANDS OF KING PRATAP. HE GOES BACK TO HIS KINGDOM WITHOUT VIBHA, HIS NEWLYWED WIFE. HE SENDS MESSAGES FOR HER TO COME AND JOIN HIM BUT SHE REFUSES TO JOIN HIM AS HER BROTHER IS UNDER IMPRISONMENT. THIS IS A STORY OF THE TRUE LOVE OF A BROTHER AND A SISTER AND THEIR UNCLE. THEY ALL ARE BRUTALLY TREATED AT THE HANDS OF THE KING WHO BELIEVES ONLY IN KNIGHTHOOD AND NOT KINDNESS.
ONE WELL EDUCATED GIRL FROM A BENGALI BRAHMIN FAMILY MARRIED A FOREIGNER MUSLIM YOUTH AGAINST THE WISHES OF HER FAMILY. SHE WENT TO VISIT HER INLAWS STAYING IN A SMALL VILLAGE IN AFGHANISTAN WITH HIGH HOPES AND FAITH. ONCE SHE REACHED THE VILLAGE SHE REALISED THE FACT THAT THERE WERE ROADS TO ENTER THIS COUNTRY BUT NOT TO MOVE OUT OF THE COUNTRY. ALL THE PEOPLE WERE NOT BAD BUT SOME WERE MEAN, SOME WERE SELFISH. SHE WAS IMPRISONED THERE BECAUSE OF SUCH PEOPLE. SHE SUFFERED A LOT DURING THE 8 YEARS OF HER IMPRISONMENT; SHE EXPERIENCED MANY A GOOD AND BAD THINGS. THIS STORY PRESENTS THE HAIRRAISING EXPERIENCES WHEN SHE TRIED TO RUN AWAY TO INDIA, AWAY FROM HER STAGNANT LIFE THERE, AWAY FROM THE TALIBANI FANATICS AFTER FACING THEIR OPPOSITION COURAGEOUSLY. WE SHIVER TO OUR BONES WHILE READING HER STORY.
TRANSLATED BY MRINALINI GADKARI. THIS LIFE IS A HARMONIOUS BRAID WOVEN TOGETHER WITH THE BEAUTIFUL FEELINGS OF HUMAN BEINGS. NATURE IS ALWAYS IN ACCORDANCE WITH IT. RAVINDRANATH S LITERATURE HOLDS A SPECIAL PLACE FOR HUMAN BEINGS AND NATURE. IN HIS STORIES, NATURE IS NOT THERE FOR THE SAKE OF BEING. IT IS THERE AS A SEPARATE CHARACTER. IT PLAYS IMPORTANT ROLE WITH THE MOOD SWINGS OF HUMAN BEINGS. ITS CHANGING NATURE REFLECTS THE CHANGING OF MOODS. THESE STORIES WHERE EQUAL WEIGHTAGE IS GIVEN TO
THE THREE STORIES, RAVIVAR, AKHERACHA SHABD AND LABORATORY, INCLUDED HEREIN WERE ORIGINALLY WRITTEN BY RABINDRANATH TAGORE DURING 1938-1940. CONSIDERING HIS LIFE-SPAN FROM 1861-1941, IT IS CLEAR THAT HE WROTE THEM AT THE END OF HIS LIFE. ALL THESE WERE LONG STORIES DIFFERING IN STYLE OF CARICATURES AND TECHNIQUES COMPARED TO HIS EARLIER WRITINGS. THE MAIN CHARACTERS FROM THESE STORIES ARE SCIENTIST, ARTIST AND TECHNICIAN WHICH IS QUITE REMARKABLE. YET, WHAT WE RECALL THE BEST ARE THE CHARACTERS OF WOMEN IN EACH STORY, VIBHA, ACHIRA AND SOHINI. ALL THESE THREE ARE EXCEPTIONAL IN THEIR OWN WAY. WHILE ESTABLISHING RELATION WITH THE MALES THEY DECIDE UPON ITS LIMITATION AS WELL. THEIR INDEPENDENT NATURE GIVES THEM UNIQUE IDENTITY WHICH IS WHY THE TRIO IS SO DIFFERENT FROM THE CHARACTERS IN RABINDRANATH TAGORE'S EARLIER STORIES, HENCE THE NAME 'TEEN SANGATINEE.'
रवीन्द्रनाथ एक गीत हैं, रंग हैं और हैं एक असमाप्त कहानी। बांग्ला में लिखने पर भी वे किसी प्रांत और भाषा के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि समय की चिंता में मनुष्य को केन्द्र में रखकर विचार करने वाले विचारक भी हैं। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' उनके लिए नारा नहीं आदर्श था। केवल 'गीतांजलि' से यह भ्रम भी हुआ कि वे केवल भक्त हैं, जबकि ऐसा है नहीं। दरअसल, हिवटमैन की तरह उन्होंने 'आत्म साक्ष्य' से ही अपनी रचनाधर्मिता को जोड़े रखा। इसीलिए वे मानते रहे कविता की दुनिया में दृष्टा ही सृष्टा है 'अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।' हालांकि वे पारंपरिक दर्शन की बांसुरी के चितेरे हैं, फिर भी इसमें सुर सिर्फ रवीन्द्र के हैं। अपनी आस्था और शोध के सुर । कला उनके लिए शाश्वत मूल्यों का संसार था।